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Bura Na Maano Democrazy Hai By Seema Sandeep Tiwari

Bura Na Maano Democrazy Hai

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Description of The Product

Book Title: Bura Na Maano Democrazy Hai

Author: Seema Sandeep Tiwari

Brief of The Book…

‘बुरा न मानो डेमोक्रेज़ी है’ एक ऐसा कविता-संग्रह है जो आपके बुकशेल्फ़ और दिल- दोनों में ही घर कर जाएगा। हमारे दिल, दिमाग़, देश और दुनिया में तहलका मचाते कई मुद्दों को आपके समक्ष सरल और सशक्त रूप से रखने का एक सच्चा प्रयास है। इसमें लिखीं कुछ कविताएँ आपको गुदगुदाएँगी, कुछ आपकी आँखें नम कर जाएँगी, कुछ आपके दिल को छू जाएँगी, और कुछ आपको सोचने पर मजबूर कर देंगी।

जहाँ ‘बुरा न मानो डेमोक्रेज़ी है’, ‘प्रोपेगेंडा ऊँचा रहे हमारा’, ‘चुनाव’ में देश के डेमॉक्रेसी से डेमोक्रेज़ी के सफ़र की झलक मिलती है, वहीं ‘नसीहत’ और ‘सीता कैसे मनाए दशहरा’ हमारे पुरुष प्रधान समाज के दोगलेपन को उजागर करती है। एक तरफ़ ‘पापा के कंधे’, ‘माँ के हाथों का जादू’ माता-पिता के असीम प्रेम को समर्पित है; वहीं दूसरी ओर ‘अंक’ और ‘मुझसे व्यापार न होगा’ माता-पिता की महत्वाकांक्षाओं के बोझ को उठाते नन्हे कंधों की गुहार है।

प्रेम (‘आईना’, ‘शिकवा’), ऊपरवाले (‘क़ाबिल’, ‘खिलौना’), हम-आप (‘काफ़िर’, ‘ख़ून’, ‘भुलक्कड’) के ख़िलाफ़ दर्ज कुछ शिकायतें भी हैं। सीमा संदीप तिवारी का यह कविता-संग्रह भावनाओं का वो आईना है जिसके समक्ष आते ही हर मुद्दे में आपको समाज का ही नहीं, अपना भी अक्स कहीं-न-कहीं ज़रूर नज़र आएगा।




About The Author

जन्म से भारतीय। दिल से मुम्बईकर। कर्म से कवयित्री। सातवीं कक्षा में जब इन्होंने ‘क्लास मॉनिटर’ होने की आपबीती अपनी अध्यापिका को सुनाई, तो उन्होंने कहा, “यह शिकायत नहीं, कविता है।” जो दर्द ये सबसे छिपाना चाहती थीं, उन्होंने झट से स्कूल की वार्षिक पत्रिका में छापकर जग-ज़ाहिर कर दिया।

जब ‘भूकंप की संहारलीला’ पर अपने मन की वेदना व्यक्त की, तो अध्यापिका ने नम आँखों से कहा, “तुम बड़ी होकर चाहे जो बन जाना, पर कविता लिखना मत छोडऩा।” स्कूल छूटा। कॉलेज छूटा। नौकरी छूटी। यहाँ तक कि देश भी छूटा। लेकिन कविता लिखना नहीं छूटा। क्योंकि ये कविता-लेखन को शौक़ नहीं, अपनी जि़ंदगी मानती हैं।

Important Note

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